बालोतरा। शहर में इन दिनों आंखों की जांच के नाम पर ‘नजर का धोखा’ बड़े पैमाने पर चल रहा है। गली-मोहल्लों में खुलीं चश्मे की दुकानों पर बिना किसी वैध मेडिकल डिग्री या तकनीकी विशेषज्ञता के आंखों की जांच की जा रही है। हैरानी की बात यह है कि इन दुकानों का मुख्य उद्देश्य लोगों की नजर सुधारना नहीं, बल्कि महज महंगे फ्रेम और लेंस बेचना रह गया है।
महंगे फ्रेम के चक्कर में गलत नंबर का खेल
सूत्रों के अनुसार, कई ऑप्टिकल संचालक ग्राहकों को लुभाने के लिए दुकान के बाहर ही ‘कंप्यूटराइज्ड मशीन’ लगाकर मुफ्त जांच का दावा करते हैं। जांच करने वाले व्यक्ति के पास न तो ऑप्टोमेट्री की डिग्री होती है और न ही कोई क्लीनिकल अनुभव। महज मशीन द्वारा निकाली गई पर्ची के आधार पर ग्राहकों को चश्मा थमा दिया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मशीनी जांच के बाद भी क्लीनिकल ट्रॉयल और आंखों की स्थिति को समझना जरूरी होता है, जिसे केवल एक विशेषज्ञ ही कर सकता है। गलत नंबर का चश्मा पहनने से सिरदर्द, आंखों में भारीपन और लंबे समय में दृष्टि दोष बढ़ने का गंभीर खतरा रहता है।
नागौर में कार्रवाई के बाद बालोतरा में सुगबुगाहट
हाल ही में पड़ोसी जिले नागौर में इसी तरह के मामले सामने आने के बाद वहां के स्वास्थ्य विभाग ने सख्त रुख अपनाया है। नागौर में बिना डिग्री जांच करने वाली दुकानों पर छापेमारी और जांच के आदेश जारी किए गए हैं। इस कार्रवाई के बाद बालोतरा में भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। यहां के स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग बालोतरा की दुकानों की भी औचक जांच करे ताकि लोगों की अनमोल आंखों को सुरक्षित रखा जा सके।
क्या कहता है नियम?
मेडिकल काउंसिल के नियमों के अनुसार, आंखों की जांच केवल एक योग्य ऑप्टोमेट्रिस्ट या नेत्र रोग विशेषज्ञ (Ophthalmologist) ही कर सकता है। ऑप्टिकल दुकानों को केवल चश्मा बनाने (डिस्पेंसिंग) की अनुमति होती है, जब तक कि वहां कोई डिग्री धारक विशेषज्ञ नियुक्त न हो।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
बालोतरा में यह अवैध कारोबार लंबे समय से फल-फूल रहा है, लेकिन अभी तक स्थानीय स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिली है। जनता के मन में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे या लोगों की आंखों की रोशनी प्रभावित होने का इंतजार कर रहा है?
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