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डॉलर को झटका: रूसी तेल के लिए भारत का नया ‘पेमेंट प्लान’, अब रुपया, दिरहम और युआन में होगा खेल

नई दिल्ली: वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल और अमेरिकी आर्थिक नीतियों में आ रहे बदलावों के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। रूस से कच्चे तेल के आयात के लिए भारत अब अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता को धीरे-धीरे कम कर रहा है। ब्लूमबर्ग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिफाइनर अब पेमेंट के लिए वैकल्पिक मुद्राओं (Alternative Currencies) का इस्तेमाल कर रहे हैं।

कैसे काम कर रहा है नया पेमेंट मॉडल?

खबरों के मुताबिक, भारतीय रिफाइनर रूसी विक्रेताओं को भुगतान करने के लिए ‘विशेष विदेशी बैंक खातों’ (Special Vostro Accounts) का उपयोग कर रहे हैं। इस प्रक्रिया को तीन चरणों में समझा जा सकता है:

  1. भारतीय बैंक इन विशेष खातों में भारतीय रुपया (INR) जमा करते हैं।

  2. इसके बाद, इस राशि को यूएई के दिरहम (AED) या चीनी युआन (CNY) में बदला जाता है।

  3. अंततः, रूसी विक्रेताओं को उनकी पसंदीदा मुद्रा में भुगतान मिल जाता है।

हैरानी की बात यह है कि इस पूरे लेनदेन में उन भारतीय बैंकों की भूमिका अहम है जिनकी विदेशी उपस्थिति सीमित है, ताकि वे वैश्विक प्रतिबंधों के सीधे रडार से बच सकें।

6 करोड़ बैरल की बड़ी डील

मार्च 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय रिफाइनरों ने अगले महीने की डिलीवरी के लिए लगभग 6 करोड़ बैरल रूसी तेल खरीदा है।

  • प्रीमियम पर खरीदारी: यह कार्गो ब्रेंट क्रूड के मुकाबले 5 डॉलर से 15 डॉलर प्रति बैरल के प्रीमियम पर बुक किए गए हैं।

  • वजह: खाड़ी देशों (Middle East) में चल रहे तनाव और ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ में आपूर्ति बाधित होने के कारण भारत के लिए रूस एक भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरा है।

डॉलर से दूरी क्यों?

भारत का यह कदम केवल व्यापारिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी है:

  • अमेरिकी नीतियों में बदलाव: अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों और टैरिफ नीतियों में किए जा रहे बदलावों के जोखिम को कम करना।

  • रुपये को मजबूती: अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपये की स्वीकार्यता बढ़ाना।

  • सस्ता विकल्प: मध्य पूर्व के तेल के मुकाबले रूसी तेल अभी भी भारत के लिए किफायती और सुलभ बना हुआ है।

“यह बदलाव वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की बढ़ती स्वायत्तता को दर्शाता है। हम अब केवल एक मुद्रा या एक बाजार पर निर्भर नहीं रहना चाहते।” – बाजार विशेषज्ञ


क्या होगा असर?

भारत अब सिंगापुर डॉलर और हांगकांग डॉलर में भी भुगतान की संभावनाओं को तलाश रहा है। यदि यह मॉडल सफल रहता है, तो आने वाले समय में वैश्विक तेल व्यापार में डॉलर का वर्चस्व कम हो सकता है।

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