नई दिल्ली। इंग्लैंड और वेल्स के हाई कोर्ट ने बिजनेसमैन राज कुंद्रा को इमर्जिंग मीडिया वेंचर्स (ईएमवी) को 4.94 मिलियन डॉलर चुकाने का आदेश दिया है। इसके साथ ही, कोर्ट ने उन्हें आईपीएल फ्रेंचाइजी राजस्थान रॉयल्स में अपनी पुरानी हिस्सेदारी को लेकर भारत में कानूनी कार्रवाई करने से हमेशा के लिए रोक दिया है। यह निवेश फर्म के लिए एक बड़ी कानूनी जीत है।
यह फैसला ईएमवी और उसके शेयरधारकों द्वारा राजस्थान रॉयल्स में अपनी कंट्रोलिंग हिस्सेदारी (बहुमत हिस्सेदारी) अरबपति लक्ष्मी मित्तल और उनके परिवार के नेतृत्व वाले एक ग्रुप को बेचने के कुछ महीनों बाद आया है। इस बिक्री में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला भी पार्टनर थे। खबरों के अनुसार, 1.65 बिलियन डॉलर की यह डील इंडियन प्रीमियर लीग के इतिहास की सबसे बड़ी डील में से एक है।
यह फैसला फ्रेंचाइजी में कुंद्रा की पुरानी 11.7 प्रतिशत हिस्सेदारी को लेकर लंबे समय से जारी विवाद के बाद लिया गया है। कुंद्रा ने आरोप लगाया था कि उन्हें अपनी हिस्सेदारी टीम की असल कीमत से बहुत कम दाम पर बेचने के लिए मजबूर किया गया था।
इस साल की शुरुआत में जब कंट्रोलिंग हिस्सेदारी की बिक्री की प्रक्रिया आगे बढ़ी, तो कुंद्रा ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) और बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से ईएमवी और उसके को-फाउंडर मनोज बडाले पर धोखाधड़ी और बातें छिपाने का आरोप लगाया, बीसीसीआई और अन्य अधिकारियों के पास जाने की धमकी दी, और इस डील को रोकने या उसमें बाधा डालने की कोशिश की।
ईएमवी ने तर्क दिया कि कुंद्रा की हरकतें 2019 के सेटलमेंट एग्रीमेंट का उल्लंघन थीं। इस एग्रीमेंट के तहत उन्होंने 4.94 मिलियन यूएस डॉलर स्वीकार किए थे, राजस्थान रॉयल्स के शेयरों पर अपने सभी अधिकार छोड़ दिए थे और सहमति जताई थी कि इस मामले से जुड़े किसी भी भविष्य के विवाद पर सिर्फ इंग्लैंड की अदालतों का अधिकार क्षेत्र होगा।
2015 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आईपीएल मुकाबलों में सट्टेबाजी का दोषी पाए जाने के बाद कुंद्रा राजस्थान रॉयल्स से बाहर हो गए थे।
फैसले के बाद, उन्होंने 2019 के सेटलमेंट एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने से पहले ‘शेयर ट्रांसफर एग्रीमेंट’ के तहत अपनी हिस्सेदारी ट्रांसफर कर दी थी। इस एग्रीमेंट ने उन्हें मालिकाना हक का कोई और दावा करने, इंग्लैंड के बाहर कानूनी कार्रवाई शुरू करने या शेयर ट्रांसफर के बारे में सार्वजनिक रूप से आरोप लगाने से रोक दिया था।
जस्टिस ग्रिफिथ्स ने फैसला सुनाया कि कुंद्रा के पास ईएमवी के दावे का सफलतापूर्वक बचाव करने की ‘कोई वास्तविक संभावना’ नहीं थी। साथ ही, कोर्ट को उनके इन आरोपों का ‘कोई सबूत नहीं’ मिला कि 2015 का शेयर ट्रांसफर एग्रीमेंट या 2019 का सेटलमेंट एग्रीमेंट धोखाधड़ी या अनुचित व्यवहार से हासिल किया गया था।
कोर्ट ने पाया कि कुंद्रा ने कानूनी सलाहकारों की मौजूदगी में अपनी मर्जी से दोनों एग्रीमेंट किए थे। फैसले में जनवरी में जारी किए गए ‘एंटी-सूट इंजेक्शन’ (मुकदमा रोकने के आदेश) को भी स्थायी कर दिया गया। इस आदेश के तहत कुंद्रा और कुकी इन्वेस्टमेंट्स को मुंबई में कंपनी याचिका आगे बढ़ाने या भारत में संबंधित कानूनी कार्रवाई शुरू करने से रोका गया था, क्योंकि ऐसा करना सेटलमेंट की ‘एक्सक्लूसिव इंग्लिश ज्यूरिस्डिक्शन क्लॉज’ (सिर्फ इंग्लैंड के अधिकार क्षेत्र वाली शर्त) का उल्लंघन होता।
कोर्ट ने कुंद्रा और कुकी इन्वेस्टमेंट्स को संयुक्त रूप से और अलग-अलग, 4.94 मिलियन यूएस डॉलर की सेटलमेंट राशि ब्याज सहित चुकाने का निर्देश भी दिया। कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि ईएमवी ने बार-बार उल्लंघन के कारण सेटलमेंट एग्रीमेंट को सही तरीके से खत्म किया था।
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