भारत के समुद्री सीमाओं (Offshore Areas) में बहुत बड़े पैमाने पर कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस छिपे होने का अनुमान है. हालांकि, गहरे और अति-गहरे पानी (Deepwater & Ultra-deepwater) में खोज करना बेहद चुनौतीपूर्ण और खर्चीला काम होता है. ‘समुद्र मंथन’ योजना के जरिए सरकार खुद बड़ा निवेश करके पूरे समुद्री इलाके में वैज्ञानिक खोज, डेटा मैपिंग और ड्रिलिंग को रफ्तार देगी.
New Delhi. भारत लंबे समय से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विदेशी कच्चे तेल और गैस के आयात पर निर्भर रहा है. लेकिन अब समुद्र की गहराइयों में छिपे ‘ऊर्जा के खजाने’ को बाहर निकालने के लिए सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है. शुक्रवार को हुई कैबिनेट मीटिंग में ‘समुद्र मंथन’ यानी नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम (National Offshore Exploration Scheme) को मंजूरी दे दी गई है.
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की इस केंद्रीय क्षेत्र की योजना के लिए सरकार ने ₹84,084 करोड़ का भारी-भरकम बजट तय किया है. यह योजना वित्त वर्ष 2030–31 तक लागू रहेगी.
क्या है ‘समुद्र मंथन’ मिशन?
2025 के स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से देश के सामने समुद्र के सीने से ऊर्जा निकालने का विजन रखा था. भारत के समुद्री सीमाओं (Offshore Areas) में बहुत बड़े पैमाने पर कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस छिपे होने का अनुमान है. हालांकि, गहरे और अति-गहरे पानी (Deepwater & Ultra-deepwater) में खोज करना बेहद चुनौतीपूर्ण और खर्चीला काम होता है. ‘समुद्र मंथन’ योजना के जरिए सरकार खुद बड़ा निवेश करके पूरे समुद्री इलाके में वैज्ञानिक खोज, डेटा मैपिंग और ड्रिलिंग को रफ्तार देगी.
इस योजना के तहत क्या-क्या काम होगा?
- समुद्र मंथन योजना के तहत समुद्री ऊर्जा खोज की पूरी सप्लाई चेन को आधुनिक बनाया जाएगा
- समुद्र के नीचे की चट्टानों और सतहों का हाई-क्वालिटी सिस्मिक डेटा इकट्ठा और प्रोसेस किया जाएगा, ताकि पता चल सके कि तेल या गैस कहां मौजूद है.
- उन अनजान और कठिन समुद्री क्षेत्रों (Frontier Basins) में ड्रिलिंग की जाएगी, जहां अब तक कोई नहीं पहुंच सका है.
- समुद्र से निकाले गए तेल और गैस को किनारे तक लाने (Production & Evacuation) के लिए साझा और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया जाएगा.
- देश में ही एक समर्पित Oil & Gas Manufacturing and Services Zone स्थापित किया जाएगा, जिससे ड्रिलिंग उपकरण और तकनीक भारत में ही बन सकें.
- प्रोजेक्ट्स के मैनेजमेंट के लिए एडवांस डिजिटल सिस्टम और दुनिया की बेहतरीन तकनीकों का इस्तेमाल होगा.
ONGC के लिए बड़ी खबर क्यों?
भारत की महारत्न सरकारी कंपनियां, खासकर- ONGC (ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन) और GAIL (गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड), लंबे समय से भारत के ऑफशोर ब्लॉकों में काम कर रही हैं.
गहरे समुद्र में ड्रिलिंग करना काफी खर्चीला और जोखिम भरा होता है. सरकार के 84,000 करोड़ रुपये से अधिक के डायरेक्ट सपोर्ट से इन कंपनियों की वित्तीय लागत कम होगी. साझा प्रोडक्शन और पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर मिलने से कंपनियां तेजी से उत्पादन शुरू कर पाएंगी. सिस्मिक डेटा उपलब्ध होने से कंपनियों को यह तय करने में आसानी होगी कि कहां कुएं खोदने पर तेल-गैस मिलने की संभावना सबसे ज्यादा है.
ONGC ने MN-DW18-1-H-D नाम के पहले डीपवॉटर एक्सप्लोरेटरी वेल की ड्रिलिंग शुरू की है. यह कुआं ओडिशा के कोणार्क तट से करीब 23 नॉटिकल मील दूर महानदी ऑफशोर बेसिन में स्थित है. यह ‘समुद्र मंथन’ मिशन के तहत शुरू किए गए चार प्रस्तावित डीपवॉटर कुओं में पहला है. इस अभियान को ONGC के DeepX Deepwater Exploration Mission Centre का तकनीकी समर्थन मिला हुआ है.
सरकार का मानना है कि भारत के पूर्वी और पश्चिमी ऑफशोर बेसिनों में 3,000 मीटर तक की गहराई में बड़े पैमाने पर तेल और गैस के भंडार मौजूदा हैं. इन क्षेत्रों में 5,600 MMTOE (Million Metric Tonnes of Oil Equivalent) से अधिक हाइड्रोकार्बन संसाधनों की संभावना है. हाल के वर्षों में उत्कल, कोणार्क, कावेरी और अंडमान बेसिन में हुई खोजों ने इन संभावनाओं को और मजबूत किया है.
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