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RBI bans HDFC's digital service

नकद सर्टिफिकेट न देने पर HDFC बैंक दोषी करार, उपभोक्ता आयोग का बड़ा फैसला

New delhi. जम्मू-कश्मीर के बारामुला ज़िले की उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने HDFC बैंक को दो वैध नकद प्रमाणपत्र (Cash Certificates) का भुगतान न करने के मामले में दोषी ठहराया है। आयोग ने यह स्पष्ट किया कि बैंक की मुहर और हस्ताक्षर वाले दस्तावेज़ को नकारना ग्राहक की सेवा में भारी कमी है और बैंक इस गलती की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।

क्या हुआ था?

एक ग्राहक ने HDFC बैंक से ₹2 लाख और ₹4.35 लाख के दो नकद प्रमाणपत्र लिए थे। जब पहले सर्टिफिकेट की परिपक्वता (maturity) के बाद वह राशि निकालने बैंक पहुँचे, तो उन्हें बताया गया कि बैंक के पास इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। दूसरे प्रमाणपत्र के बारे में पूछने पर भी यही जवाब मिला।
ग्राहक ने बार-बार अनुरोध कर बैंक से जाँच की मांग की, तब बैंक ने कहा कि यह प्रमाणपत्र संभवतः उस समय कार्यरत कर्मचारी सफदर खान द्वारा जारी किए गए होंगे। ग्राहक ने स्पष्ट किया कि उसने राशि सीधे बैंक में जमा कराई थी, किसी कर्मचारी को व्यक्तिगत रूप से नहीं दी थी।

बैंक का जवाब:

बैंक ने अपने लिखित जवाब में दावा किया कि दोनों प्रमाणपत्र फर्जी हैं और उनके रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हैं। हालांकि, बैंक ने यह भी माना कि संदिग्ध कर्मचारी सफदर खान को निलंबित किया गया है। इसके बावजूद, बैंक ने किसी प्रकार की सेवा में कमी से इनकार किया और अदालत में पेश भी नहीं हुआ, जिससे मामला एकतरफा (ex parte) सुना गया।
आयोग ने क्या कहा:
आयोग के अध्यक्ष पीरजादा कौसर हुसैन और सदस्य नायला यासीन ने कहा कि बैंक अपने कर्मचारी की गलती से पल्ला नहीं झाड़ सकता। बैंक और कर्मचारी के बीच प्रत्यक्ष संबंध होता है, और कर्मचारी द्वारा की गई कार्रवाई की जिम्मेदारी बैंक पर होती है।
आयोग ने यह भी कहा कि बैंक ने निष्पक्ष जांच नहीं की और ग्राहक को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, जो सेवा में कमी का स्पष्ट उदाहरण है।
1992 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले (PNB बनाम सुरेंद्र प्रसाद सिन्हा) का हवाला देते हुए आयोग ने कहा कि बैंक केवल इस आधार पर दस्तावेजों से इंकार नहीं कर सकता कि वे उनके सिस्टम में दर्ज नहीं हैं।

अंतिम आदेश:

आयोग ने HDFC बैंक को आदेश दिया कि ग्राहक को दोनों नकद प्रमाणपत्रों की परिपक्व राशि के साथ ब्याज सहित भुगतान करे। साथ ही ₹50,000 मानसिक प्रताड़ना के लिए, ₹20,000 कानूनी खर्चों के लिए और ₹10,000 बारामुला उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा करने का आदेश दिया।
बैंक को स्वतंत्र जांच कर दोषी कर्मचारी पर कार्रवाई की अनुमति दी गई है।

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