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शहर के बड़े बिल्डरों पर जेडीए रहता है महरबान, जेएलएन मार्ग के नाले पर ज्वैल ऑफ इंडिया का कब्जा

नाले की चौडाई और बहाव क्षेत्र भी किया कम, सरकारी जमीन पर डवलपर द्वारा बनाया गया पूल, जेडीए अब नोटिस देखकर खानापूर्ति कर रहा

जयपुर. जवाहर लाल नेहरू मार्ग और गौरव टावर के करीब स्थित ज्वैल्स आफ इंडिया प्रोजेक्ट के डवलपर सनसिटी ग्रुप द्वारा करोड़ों की सरकारी जमीन और नाले के हिस्से पर कब्जा कर लिया गया है। सांगानेर तहसील के ग्राम झालाना डूंगर के खसरा नंबर 180, 181, 184 और 186 की जिस जमीन में ज्वैल्स ऑफ इंडिया का रेजीडेंशियल कम कॉमर्शियल प्रोजेक्ट बना है, उसका टाइटल अब भी क्लियर नहीं है और प्रोजेक्ट में कई खामियां होने के बाद भी जेडीए कार्रवाई करने में असमर्थता दिखा रहा है।

इस प्रोजेक्ट की जमीन पर सरकारी नाला है, लेकिन डवलपर ने इस जमीन पर पूल बनवा कर आने—जाने का रास्ता बना लिया और गार्ड रूम भी वहीं बनवा दिया। इसके साथ ही सटकर लगी सरकारी जमीन पर भी डवलपर ने कब्जा किया हुआ है। जमीन का टाइटल को लेकर पहले ही यह जमीन विवादित है।

जेडीए लगातार कर रहा नजरअंदाज

जेडीए का ध्यान इस प्रोजेक्ट को लेकर नहीं जा रहा है। सूत्रों के अनुसार कई एनजीओ और व्यक्तिगत शिकायतें भी हुई लेकिन जेडीए ने नोटिस देकर खानापूर्ति कर ली। इस प्रोजेक्ट के डवलपर सनसिटी इन्फ्रा द्वारा किए गए सरकारी नाले पर कब्जे की शिकायत पीएमओ तक गई लेकिन जेडीए कार्रवाई करने से बच रहा है।

जमीनी हकीकत…

दरअसल, यह 205 बीघा 8 बिस्वा जमीन दो अलग-अलग आदेश (लीजडीड) के जरिए राज्य सरकार ने उद्योग लगाने के लिए मैसर्स कैप्सटन मीटर्स इंडिया लिमिटेड को 99 साल की लीज पर वर्ष 1965 में सरकारी जमीन अलॉट की थी। यह अवधि सन् 2064 तक होती है। राज्य सरकार के पोर्टल अपना खाता पर आज भी यह जमीन मैसर्स कैप्सटन मीटर्स इंडिया के नाम औद्योगिक प्रयोजन के लिए 99 साल की लीज दर्ज है। वैसे तो इंडस्ट्रीज का उद्देश्य पूरा नहीं होने पर यह जमीन वापस राज्य सरकार को मिलनी चाहिए थी। अगर सरकार ने अपनी जमीन वापस नहीं ली तो भी पट्टे के लिए भूमि समर्पित करने के कारण खातेदारी जेडीए के नाम पर दर्ज होनी चाहिए थी। तभी वह 99 साल की लीज पर जमीन का पट्टा जारी कर सकता था। क्योंकि राजस्व रिकॉर्ड में खातेदारी दर्ज होने से ही जेडीए को जमीन का मालिकाना हक मिलता। जैसे आमतौर पर नियमन के प्रकरणों में होता है।

राजस्व रिकॉर्ड में गलत तरीके से दर्ज हुआ लीज धारक का नाम

एक्सपर्ट्स की मानें तो लीजधारक का नाम राजस्व रिकार्ड में बतौर खातेदार दर्ज होना ही गलत है। पहली लीज खत्म हुए बिना जेडीए द्वारा लीजधारक को नया पट्टा फिर 99 साल के लिए जारी नहीं किया जा सकता था। फिर भी पहली लीज सन्, 2064 में खत्म होने का इंतजार किए बिना ही जेडीए आगे फिर वर्ष 2008 में 99 साल की लीज का पट्टा जारी कर दिया। इससे लीज अवधि स्वतः बढ़कर सन् 2107 तक हो गई। यानि 43 साल की लीज और बढ़ गई।

राजस्व कानूनों के एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर यह जमीन कैपस्टन मीटर्स को ही देनी थी तो राज्य सरकार पहली लीज खत्म करके राजस्व रिकॉर्ड खातेदारी कैप्सटन मीटर्स के नाम दर्ज करती। फिर कैप्सटन मीटर अपने खातेदारी अधिकार समर्पित करके उस जमीन को री-अलॉट करवा सकती थी।

तीन पार्टनरों का ज्वाइंट वेंचर

जेडीए ने संयुक्त एग्रीमेंट (ज्वाइंट कोलोबरेशन) के आधार पर 1 जुलाई, 2008 को 72967 वर्गमीटर जमीन पर ज्वैल्स ऑफ इंडिया नामक आवासीय कम कामर्शियल प्रोजेक्ट के लिए राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 90बी के तहत मैसर्स जय ड्रिंक्स प्रा. लि. को पट्टा जारी किया है। जबकि धारा 90बी के प्रावधान मूलतः कृषि उपयोग की खातेदारी जमीन पर लागू होते हैं। ना कि औद्योगिक प्रयोजन वाली लीज की जमीन पर। बता दें कि ज्वैल्स ऑफ इंडिया प्रोजेक्ट तीन पार्टनरों का ज्वाइंट बेंचर है। इसमें मैसर्स सनसिटी प्रोजेक्ट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जय ड्रिंक्स इंडिया प्रा. लि. और कैप्सटन मीटर्स इंडिया प्रा. लि. सैकंड पार्टी हैं।

यहां कर्मचारी कल्याण सेंटर और उनके आवास बनने थे

दरअसल, राज्य सरकार ने 22 अप्रैल, 1965 को सांगानेर तहसील के गांव झालाना डूंगर के पुराने खसरा नंबर 115 और 115/195 की 132 बीघा 5 बिस्वा भूमि कैप्सटन मीटर्स इंडिया लि. को इंडस्ट्रीज लगाने के लिए 99 साल की लीज पर आवंटित की थी। इसके बाद 19 अक्टूबर, 1965 को यहीं खसरा नंबर 18, 522, 525, 526 और 530 की 73 बीघा 3 बिस्वा जमीन और इसी उद्देश्य के लिए आवंटित की थी। इस तरह कुल 205 बीघा 8 बिस्वा जमीन लीज पर देने का उद्देश्य यहां प्लांट, मशीनरी, कॉमर्शियल ऑपरेशन के साथ ही यहां कंपनी कर्मचारियों के लिए वेलफेयर सेंटर और आवास बनाए जाने थे। लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ। बल्कि सरकार की मिलीभगत से जमीन को हड़प लिया गया।

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