जयपुर। टाटा संस में एन. चंद्रशेखरन की चेयरमैन के तौर पर दोबारा नियुक्ति को लेकर टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच जारी विवाद अब कॉरपोरेट गवर्नेंस के मुद्दे तक पहुंच गया है। टाटा ट्रस्ट्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी है कि कंपनी के शेयरधारकों के अधिकारों को कमजोर या समाप्त करने की कोशिश से भारत में कॉरपोरेट गवर्नेंस की व्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है।
सिंघवी ने कहा कि टाटा समूह में मालिकाना हिस्सेदारी रखने वाले शेयरधारकों के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, यदि शेयरधारकों के अधिकारों को कमजोर करने की ऐसी व्यवस्था स्वीकार की जाती है, तो इसका असर केवल टाटा समूह तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की सैकड़ों-हजारों कंपनियों के कॉरपोरेट ढांचे और गवर्नेंस पर भी पड़ सकता है।
टाटा समूह से पुराना कानूनी जुड़ाव
अभिषेक मनु सिंघवी का बड़े कॉरपोरेट विवादों में पैरवी करने का लंबा रिकॉर्ड रहा है। 2016 में साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद टाटा समूह में हुए विवाद में भी उन्होंने टाटा संस की ओर से पैरवी की थी। यही वजह है कि मौजूदा विवाद में उनकी भूमिका पर भी खास नजर है।
सिंघवी देश के कई बड़े कारोबारी समूहों से जुड़े कानूनी मामलों में भी पेश हो चुके हैं। इनमें रिलायंस समूह, अडानी समूह, भारती एयरटेल, वोडाफोन और महिंद्रा समूह जैसे नाम शामिल रहे हैं। प्रतिस्पर्धा कानून और बड़े कॉरपोरेट सौदों से जुड़े मामलों में उनकी कानूनी टीम की भूमिका का उल्लेख विभिन्न मामलों और रिपोर्टों में मिलता रहा है।
रिलायंस से जुड़े मामलों में कृष्णा-गोदावरी बेसिन गैस विवाद सहित कई कॉरपोरेट एवं प्रतिस्पर्धा कानून मामलों में उनकी पैरवी का रिकॉर्ड रहा है। वहीं, अडानी समूह की विभिन्न कंपनियों से जुड़े प्रतिस्पर्धा कानून मामलों में भी उनकी फर्म की ओर से पैरवी की गई है।
बड़े कारोबारी घरानों से जुड़े रहे हैं मामले
सिंघवी की कानूनी प्रैक्टिस में बड़े कारोबारी समूहों से जुड़े मामलों की लंबी सूची रही है। रिलायंस जियो के अधिग्रहण और अन्य बड़े कॉरपोरेट सौदों से जुड़े मामलों में भी उनकी कानूनी टीम की भूमिका सामने आई है। इसके अलावा प्रेमजी इन्वेस्ट सहित अन्य बड़े कॉरपोरेट संस्थानों से जुड़े मामलों में भी उनका प्रतिनिधित्व दर्ज रहा है।
टाटा संस-टाटा ट्रस्ट्स विवाद में अब सिंघवी की दलीलों ने एक बार फिर यह सवाल केंद्र में ला दिया है कि कंपनियों में प्रमोटर, ट्रस्ट और अन्य शेयरधारकों के अधिकारों के बीच संतुलन किस तरह तय किया जाना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान कॉरपोरेट गवर्नेंस, शेयरधारकों के अधिकार और कंपनी के प्रबंधन में मालिकाना हितों की भूमिका जैसे मुद्दे प्रमुख बने हुए हैं। विवाद का असर टाटा समूह की आंतरिक व्यवस्था से आगे भारतीय कॉरपोरेट कानून और गवर्नेंस की बहस पर भी पड़ सकता है।
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