मंगलवार, अगस्त 11 2026 | 07:28:05 PM
Breaking News
Home / धर्म समाज / जैन धर्म में इस कारण कर लिया जाता है सूर्यास्त के पहले भोजन

जैन धर्म में इस कारण कर लिया जाता है सूर्यास्त के पहले भोजन

Tina surana. jaipur

जैन धर्म में अपने अलग रीती रिवाज होते हैं. इन दिनों जैन समाज (Jain samaj) के लोग पर्युषण का पर्व मना रहे हैं. जो दिगम्बर समाज के लिए 10 दिनों का होता है और श्वेताम्बर समाज के लिए 8 दिनों का. इस दौरान उन्हें काफी नियमों का पालन करना पड़ता है. पर्युषण का ये पर्व 26 अगस्त से शुरू हुआ है जो मोह माया और बुरी आदतों से दूर रखता है और आपके मन को स्वस्छ बनता है. इसके अलावा अगर हम आयुर्वेद की माने तो हमे सूर्यास्त से पूर्व भोजन कर लेना चाहिए. जैन धर्म में ये नियम है कि सूर्यास्त से पूर्व भोजन किया जाता है. इसके पीछे भी कई कारण है.

जैन धर्म में तो रात्रि भोजन करने की साफ साफ मनाही

बता दें, जैन धर्म में तो रात्रि भोजन करने की साफ साफ मनाही हैं, क्योंकि जैन धर्म अहिंसा पर जोर देता हैं फिर चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो. रात में भोजन ग्रहण नहीं करने के दो कारण हैं पहला अहिंसा और दूसरा बेहतर स्वास्थ्य. वही वैज्ञानिक शोधों से भी यह स्पष्ट हो चुका हैं. उनके अनुसार, कीटाणु और रोगाणु जिन्हें हम सीधे तौर पर देख नहीं पाते हैं वे सूक्ष्म जीव रात्रि में तेजी से फैल जाते हैं ऐसे में सूर्यास्त के बाद खाना बनाने और खाने से ये भोजन में प्रवेश कर जाते हैं और पेट में चले जाते हैं. इसके साथ ही जैन धर्म में इसे हिंसा माना जाता हैं इसलिए रात्रि में भोजन को जैन धर्म और आयुर्वेद में निषेध बताया गया हैं.

More Jain samaj News click here ….. https://www.corporatepostnews.com/jain-society-is-the-symbol-of-development-of-india/ भारत के विकास का प्रतीक है जैन समाज

सूर्यास्त से पहले भोज करने से पाचन तंत्र भी ठीक

वहीं अगर सेहत की बात करें तो सूर्यास्त से पहले भोज करने से पाचन तंत्र ठीक रहता हैं. रात्रि में हमारी पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती हैं. जल्दी भोजन करने से सोने से पूर्व भोजन को पचने के लिए पर्याप्त वक्त मिल जाता हैं. वही वर्षा ऋतु के चार महीने में चातुर्मास का पर्व मनाया जाता हैं. इस दौरान एक ही स्थान पर रहकर तप, साधना और पूजा अर्चना की जाती हें वही जैन धर्म के मुताबिक इस मौसम में अनेकों प्रकार के कीड़े और सूक्ष्म जीव पैदा हो जाते हैं इस कारण अधिक चलने फिरने से इन जीवों को नुकसान पहुंच सकता हैं इसलिए जैन साधु एक ही स्थान पर बैठकर तप, स्वाध्याय और प्रवचन करते हैं और अहिंसा का पूरी तरह से पालन भी करते हैं.

Check Also

बाबा बर्फानी का बुलावा: 15 अप्रैल से शुरू होगी अमरनाथ यात्रा की बुकिंग, जानें रजिस्ट्रेशन का पूरा तरीका

श्रीनगर/जम्मू। ‘जय बाबा बर्फानी’ के उद्घोष के साथ हिमालय की गोद में स्थित पवित्र अमरनाथ …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *