बालोतरा। बालोतरा के वस्त्र उद्योग पर लगाए जा रहे ‘प्रदूषण सेस’ (Pollution Cess) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। शहर के उद्योग जगत ने अब इस सेस की वसूली की प्रक्रिया और प्राप्त धनराशि के उपयोग की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उद्योगपतियों ने सरकार से इस पूरी व्यवस्था का लेखा-जोखा सार्वजनिक करने की मांग की है।
प्रमुख मुद्दे: अपना ETP, फिर सेस क्यों?
उद्योग प्रतिनिधियों का तर्क है कि बालोतरा की अधिकांश औद्योगिक इकाइयों ने अपने स्तर पर पर्यावरण सुरक्षा के लिए स्वयं के ‘एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट’ (ETP) स्थापित कर लिए हैं। इसके बावजूद, उन पर सेस का बोझ डाला जा रहा है। दूसरी ओर, जिस ‘कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट’ (CETP) के लिए सेस लिया जा रहा है, वह लंबे समय से प्रभावी रूप से संचालित नहीं हो पा रहा है। उद्योगपतियों का कहना है कि जो इकाई प्रदूषण फैला ही नहीं रही या जिसने अपना उपचार संयंत्र लगा रखा है, उससे समान दर पर सेस वसूलना तार्किक नहीं है।
उद्योग जगत की मुख्य मांगें
अपनी मांगों को लेकर उद्योग जगत ने प्रशासन के समक्ष कुछ स्पष्ट शर्तें रखी हैं:
- स्वतंत्र वित्तीय ऑडिट: पिछले 20 वर्षों में प्रदूषण सेस के नाम पर एकत्र की गई धनराशि का एक स्वतंत्र वित्तीय ऑडिट करवाया जाए।
- सार्वजनिक लेखा-जोखा: सेस के रूप में प्राप्त कुल राशि और उसके अब तक हुए व्यय का सार्वजनिक ब्यौरा (Public Account) जारी किया जाए।
- नीति की समीक्षा: व्यवस्था की पूरी समीक्षा की जाए और ‘प्रदूषक भुगतान करे’ (Polluter Pays Principle) के सिद्धांत के अनुरूप ही नई नीति लागू की जाए। यानी, जो वास्तव में प्रदूषण फैला रहा है, सिर्फ उसी से वसूली हो।
पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल
उद्योगपतियों का कहना है कि सेस की आड़ में उद्योगों को आर्थिक रूप से कमजोर किया जा रहा है। लंबे समय से चल रही इस विसंगति के कारण छोटे और मध्यम उद्योगों का संचालन भी कठिन हो गया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि इस मामले में निष्पक्षता और जवाबदेही तय नहीं की गई, तो भविष्य में आंदोलन का रुख अपनाया जा सकता है।
फिलहाल, इस मांग के बाद प्रशासनिक और औद्योगिक हलकों में हलचल बढ़ गई है। अब देखना यह है कि प्रदूषण नियंत्रण मंडल और जिला प्रशासन इस पर क्या रुख अपनाता है।
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