बालोतरा। कभी ‘राजस्थान के मैनचेस्टर’ के रूप में अपनी धाक जमाने वाली बालोतरा की कपड़ा इंडस्ट्री पर इस समय एक पुरानी कहावत सटीक बैठ रही है— “पहले रहते यूं तो तबले बजते क्यों?”। लूणी नदी में वर्षों से प्रवाहित किए जा रहे औद्योगिक प्रदूषण के कारण सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद, बालोतरा, जसोल और बिठूजा क्षेत्र की 800 से अधिक कपड़ा इकाइयां फिलहाल पूरी तरह से ठप पड़ी हैं।
नदी की दुर्दशा का खामियाजा भुगत रही इंडस्ट्री
बालोतरा के कपड़ा उद्योग पर लगे इस ताले के पीछे का मुख्य कारण लूणी नदी को गंभीर रूप से प्रदूषित करना है। लंबे समय से चल रहे इस प्रदूषण के विरुद्ध जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, तो न्यायपालिका ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट के आदेशों के बाद प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) ने सख्ती दिखाई है, जिसके परिणामस्वरूप एक साथ 800 से ज्यादा इकाइयों का कामकाज बंद कर दिया गया है।
सफाई की ओर बढ़ाए कदम
प्रदूषण की मार झेल रही लूणी नदी को पुनर्जीवित करने के लिए अब युद्धस्तर पर प्रयास शुरू किए गए हैं। RSPCB की देखरेख में अब सीईटीपी (CETP) प्रबंधन ने नदी में जमा जहरीली स्लज (औद्योगिक कचरा) को हटाने का कार्य शुरू कर दिया है।
- प्रभावित क्षेत्र: बालोतरा से शुरू होकर तिलवाड़ा, भीमरलाई और जावास तक नदी के बहाव क्षेत्र में वर्षों से प्रदूषित स्लज की मोटी परत जम गई है।
- प्रशासनिक निगरानी: सफाई कार्य को पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए RSPCB की टीमें लगातार मॉनिटरिंग कर रही हैं।
भविष्य की चुनौती
इतनी बड़ी संख्या में इकाइयों के बंद होने से हजारों श्रमिकों के रोजगार और व्यापारिक जगत पर गहरा संकट छा गया है। जानकारों का कहना है कि यदि उद्योगपतियों ने पूर्व में ही पर्यावरण नियमों का पालन करते हुए ‘तबले’ यानी प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों को सही ढंग से बजाया (उपयोग किया) होता, तो आज यह नौबत नहीं आती।
फिलहाल, बालोतरा की पहचान बन चुके इस उद्योग के सामने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अब पर्यावरण नियमों का पालन करना ही एकमात्र विकल्प बचा है। नदी की सफाई और भविष्य में प्रदूषण मुक्त उत्पादन ही इन इकाइयों के दोबारा शुरू होने का द्वार खोल सकता है।
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